रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है…
✍️ बाबा दीपक मोगरी ( तन्हा )
रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है,
धीरे धीरे उम्र ढल रही है…
रफ्ता रफ्ता…
सुबह होती है और शाम ढलती है,
थकी-थकी सी हर दोपहर गुजरती है।
भाग-दौड़ में उलझा इंसान,
अब खुद से ही दूर होता जा रहा है।
रातों की नींद कहीं खो गई है,
और जिंदगी बस जिम्मेदारियों में सिमट रही है।

रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है…
जीवन में रिश्ते क्यों बदल रहे हैं?
जो अपने थे, आज पराए क्यों लग रहे हैं?
बातों में मिठास कम होती जा रही है,
रिश्तों में कड़वाहट भरती जा रही है।
परिवार की डोर धीरे-धीरे टूट रही है,
और हर चेहरा अब नकाब में दिख रहा है।
रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है…
मन उदास है, दिल बेकरार है,
अंदर ही अंदर कोई आग जल रही है।
ए दिल, अब किसी को मत पुकार,
यह दुनिया जैसे बहरी हो गई है।
यहाँ दर्द सुनने वाले कम,
और तमाशा देखने वाले ज्यादा मिलते हैं।
रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है…
हर कदम पर ठोकर मिली,
फिर भी इंसान चलता रहा।
पूरा जहाँ अपना नहीं लगता,
फिर भी कोई उम्मीद पलती रही।
जाएँ कहाँ, किससे कहें दिल की बात,
जब हर तरफ मतलब की दुनिया दिखाई दे।
दुनिया सच में बहुत मतलबी हो गई है…
रफ्ता रफ्ता जिंदगी चल रही है,
धीरे धीरे उम्र ढल रही है…
रफ्ता रफ्ता… हो रफ्ता रफ्ता…
🌿 निष्कर्ष
जिंदगी की यही सच्चाई है —
समय धीरे-धीरे सब बदल देता है।
लोग, रिश्ते, हालात और इंसान की सोच भी।
लेकिन फिर भी इंसान उम्मीद के सहारे चलता रहता है…
क्योंकि जिंदगी रुकती नहीं,
बस “रफ्ता रफ्ता” चलती रहती है।
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