सड़क सुरक्षा: आंकड़ों से आगे, जिम्मेदारी की ज़रूरत
(विशेष लेख)
भारत में सड़क हादसे एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। वर्ष 2025 के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें करीब 1.7 लाख लोगों की मृत्यु हुई। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की त्रासदी का संकेत हैं जो अचानक अपने प्रियजनों को खो देते हैं।
सड़क परिवहन से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही बड़ी संख्या में दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि तेज रफ्तार, नियमों की अनदेखी और लापरवाही इस समस्या की जड़ में हैं।
लेखक कई वर्षों से सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत की सड़क सुरक्षा पर आधारित पहली हिंदी फिल्म 'चलो संभल के रहो संभल' का निर्माण और निर्देशन भी किया है।"
वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में कुछ क्षेत्रों में स्थिति में आंशिक सुधार देखने को मिला है। कुछ राज्यों और शहरों में सड़क दुर्घटनाओं और मृतकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
हर वर्ष जनवरी माह में मनाया जाने वाला सड़क सुरक्षा सप्ताह भी इस संदर्भ में चर्चा का विषय रहता है। ट्रैफिक पुलिस, परिवहन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियाँ इस दौरान जागरूकता अभियान चलाती हैं, लेकिन अक्सर यह प्रयास कुछ दिनों तक सीमित होकर औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। यदि यही सक्रियता पूरे वर्ष निरंतर बनी रहे और नियमों का पालन सख्ती से कराया जाए, तो दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
एक अन्य गंभीर समस्या स्कूली छात्रों में भी देखने को मिल रही है। अक्सर नाबालिग बच्चे बिना ड्राइविंग लाइसेंस के दोपहिया वाहन लेकर स्कूल पहुंचते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उनकी और दूसरों की जान को भी जोखिम में डालता है। कई बार स्कूल प्रशासन इस ओर अनदेखी करता है, जबकि अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। बच्चों को कम उम्र में वाहन सौंपना और उनकी सुरक्षा के प्रति लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल प्रबंधन, अभिभावक और प्रशासन मिलकर इस विषय को गंभीरता से लें।
विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क हादसों के पीछे प्रमुख कारणों में तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग, हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग न करना शामिल हैं। खराब सड़कें और ड्राइविंग के दौरान थकान भी दुर्घटनाओं को बढ़ावा देती हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए केवल कड़े कानून पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभावी पालन भी जरूरी है। साथ ही, आम नागरिकों में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अंततः, सड़क सुरक्षा केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की साझा जिम्मेदारी है। यदि नियमों का पालन ईमानदारी से किया जाए, तो हजारों जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
चलों संभल के रहो, संभल के… हो न जाए हादसे।
सुरक्षा सावधानी है—इस बात को गांठ बांध लें।
✍️ संवाददाता बाबा दीपक मोगरी ‘तन्हा
.jpeg)
COMMENTS