बुढाकेदार-थौलधार ।। पौराणिक तीर्थ धाम बूढ़ाकेदार में जहां 24 से 26 तक नवंबर को गुरु कैलापीर बग्वाल मेला महोत्सव की जोर शोर से भव्य तैयारियां चल रही है। वही बूढ़ाकेदार में विगत कई वर्षों की भांति इस वर्ष भी बालिकाओं के द्वारा रामलीला का मंचन किया जा रहा है।
इस वर्ष खास बात यह है कि गढ़वाली भाषा में चौपाई संवाद कर रामलीला का मंचन कर चार चांद लगा दिए है। बालिकाओं द्वारा खेली जा रही रामलीला पूरे क्षेत्र में खासा चर्चा का विषय बना हुआ है।
रामलीला मंचन के चौथे दिन आज सीता स्वयंवर मे ग्रामीणों के द्वारा बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया गया। वही रामलीला कमेटी के द्वारा बताया गया कि थाती बूढ़ाकेदार क्षेत्र में पुरुषों का रोजगार के कारण घर से बाहर रहने वा कुछ लोगों का गांव से पलायन करने के कारण रामलीला के पात्र उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। जिस कारण बालिकाओं ने यह बेड़ा उठाकर रामलीला मंचन कर यह साबित कर दिया है कि आज के युग में बालिका किसी भी प्रतिस्पर्धा करने में कम नहीं है। रामलीला मंचन मे एक से बढ़कर एक पात्र बखूबी अपना किरदार निभा रहे हैं जिसमे कुमारी भावना नेगी, कुमारी आयुषी सेमवाल, कुमारी सोनी नेगी, कुमारी आरती रागड, कुमारी सानिया, कुमारी ज्योति बहुगुणा, कुमारी वैष्णवी सेमवाल, कुमारी भूमिका राणा, कुमारी रवीना रागड, कुमारी संध्या नेगी, कुमारी राधिका शर्मा, कुमारी दिया नेगी, आदि के द्वारा सुंदर प्रस्तुति दी जा रही।
ग्राम पंचायत मंजरुवाल में युवाओं द्वारा किया जा रहा है रामलीला का मंचन।
रामलीला मंचन के 12वें दिन लक्ष्मण शक्ति, कुम्भकरण वध, आदि लीला का मंचन दर्शाया गया।ग्रामीणों के द्वारा बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया गया। वही रामलीला कमेटी के द्वारा बताया गया कि क्षेत्र में पुरुषों का रोजगार के कारण घर से बाहर रहने वा कुछ लोगों का गांव से पलायन करने के कारण रामलीला के पात्र उपलब्ध नहीं हो पाते है। जो युवा गांव में अभी स्कूल पढ़ रहे हैं उन्हीं के द्वारा एवं कुछ गांव में रह रहे युवकों के द्वारा लीला का मंचन दर्शाया जा रहा है।
रामलीला का मंचन दर्शाने का उद्देश्य यह है। कि हमारी संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त ना हो बल्कि हमारी संस्कृति जीवित रहे और किस प्रकार से भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापस लौटे यह सब रामलीला के मंचन से सीखने को मिलता है।कहीं ना कहीं अभी हमारे पहाड़ की संस्कृति जिंदा है जिसके लिए इस प्रकार के आयोजन प्रत्येक क्षेत्र में होने जरूरी है। और इस प्रकार के आयोजनों से हमारी आने वाली पीढ़ी भी कुछ सीख पाएगी।टिहरी गढ़वाल से सुनील जुयाल की रिपोर्ट
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