॥ *ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं* ॥
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
न पहनूं कोई कनक-अम्बर
न धारूँ पीताम्बर रेशमी
मैं तो मृगछाला ओढ़ इतराऊं
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
न पहनूं वैजयंती माला
न मोहें मुझे पुष्पों की माला
लपेट नागराज वासुकी को इठलाऊं
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
नहीं चाहिये मोर मुकुट
नहीं शोभा दे स्वर्ण मुकुट
मैं तो जटा-जूट में गंगा पा जाऊं
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
न हो तन पर चन्दन-केसर
न हो सुगंधित इत्रो का लेपन
मैं तो भस्म लपेट, खुद में खो जाऊं
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
नहीं चाहिये महल-चौबारा
न भाए द्वारका सा सुख प्यारा
मैं तो कैलाश की गोद में समा जाऊं
*ऐ री सखी, मैं शिव हो जाऊं*
सुनीता निमिष सिंह
उदयपुर राजस्थान

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