श्रद्धांजली एवं सम्मान-- बना सेवा का अभियान दिवंगत बेटी दीक्षा चोपड़ा को माता- पिता ने नेहा मानव सेवा सोसायटी का सदस्य बना कर दी श्रद्धांजली

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श्रद्धांजली एवं सम्मान-- बना सेवा का अभियान
दिवंगत बेटी दीक्षा चोपड़ा को माता- पिता ने नेहा मानव सेवा सोसायटी का सदस्य बना कर दी श्रद्धांजली
आज सुबह मैने स्नेह संवाद में बेटी दीक्षा के बारे में पोस्ट शेअर की थी। आज दीक्षा की माता श्रीमती अंजली चोपड़ा एवं पिता श्री विजय कुमार चोपड़ा ने अपनी दिवंगत बेटी "दीक्षा चोपड़ा" को नेहा मानव सेवा सोसाइटी का मासिक सहयोगी सदस्य बना कर श्रद्धांजली दी है। समस्त नेहा मानव सेवा परिवार परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता है कि दीक्षा को भगवान अपने चरणों में स्थान दे। एक बार फिर से पोस्ट को शेअर कर रहा हू् ताकि आप भी दीक्षा के बारे में जान सकें व श्रद्धांजली अर्पित कर सकें
"नेहा-दीक्षा, सफर रूहानी
दो परिवार, एक कहानी
दिलों में दर्द,आंखों में पानी"
भाई जी आपकी पोस्ट पढ़ी मैने.... आपने लिखा है कि आप बचपन में युं ही नेहा से मजाक में कहते थे कि तू हमारी बच्ची नहीं है अौर हमें मसूरी में मिली हुई है तो एक बार नेहा नाराज हो गई थी व कहने लगी थी कि मैं बापिस चली जाऊंगी।
ऐसा ही वाक्य हमारे साथ भी हुआ है। हम भी अपनी दीक्षा को बचपन में ऐसा कहते थे कि तू हमें मिली हुई है, तो एक बार रूठ गई थी व कहने लगी थी कि मैं सबको छोड़ कर चली जाऊंगी। यह बात जब मुझे दीक्षा की मां अंजली चोपड़ा ने फोन पर बताई तो यादों का सिलसिला चल पड़ा। दो दिन पहले मेरी लगभग 95 मिनट अंजली से फोन पर बातें हुई। अंजली ने जो बातें बताई उनसे मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि कैसे नेहा- दीक्षा के जीवन में इतनी समानतायें रही हैं। कैसे दोनो का जीवन रुहानी रहा है।
अंजली चोपड़ा बताने लगी कि उनके घर जिला हमीरपुर के गांव तरक्वाड़ी में हैं। उनके ससुर श्री बनारसी दास चोपड़ा तरक्वाड़ी व्यापार मंडल के कई वर्षों तक प्रधान रहे हैं। मेरे पति श्री विजय कुमार चोपड़ा ने अपने पिता के व्यापार को अौर आगे बढ़ाया। शादी के बाद घर में दो बच्चों का आगमन हुआ। बड़ा बेटा गौरव चोपड़ा व बेटी दीक्षा चोपड़ा। घर में खुशियां आ गई थी। दीक्षा को सब प्यार से मिट्ठु बोलते थे। बच्चों ने अपनी पढ़ाई पूरी की। दोनो सॉफ्टवेयर इंजीनियर बने। दीक्षा चंडीगढ़ में टेक माहिंद्रा में नौकरी करने लगी।

मैने जब यह सुना तो लगा कि दोनो के परिवारों की व्यापारिक पृष्ठभूमि व जहां नेहा चंडीगढ़ में पढ़ रही थी वहीं दीक्षा चंडीगढ़ में नौकरी कर रही थी।

अंजली बताने लगी कि दीक्षा बहुत संवेदनशील बच्ची थी। दूसरों के दु:ख में दु:खी हो जाना व उनकी मदद करना उसका स्वभाव था व वह अपने जन्म दिन पर प्रवासी परिवारों के बच्चों को कपड़े, खिलौने व चौकलेट इत्यादि बांटती थी। अंजली बता रही थी तो मुझे याद आने लगा कि यह सब कुछ तो मेरी नेहा करती थी।

अंजली ने बताया कि जब उसे पहली बार कंपनी ने सम्मानित करते हुये भगवान कृष्ण का सुंदर चित्र भेंट किया तो अपने कान्हा से बहुत प्रेम करती थी। ऐसा ही प्रेम मेरी नेहा का अपने सांवरिया सेठ कान्हा से था। नेहा भी अपने सांवरिया सेठ को अपनी डायरी में पत्र लिखा करती थी व हर समय अपने कान्हा को साथ रखती थी।

दीक्षा जब घर आती तो सभी मिलने वालों से प्रेम से मिलती व बातें करती। यही स्वभाव मेरी नेहा का था।

अंजली ने बताया कि उन दिनों हम अपने घर का निर्माण कर रहे थे तो दीक्षा अपने पापा से मकान के बारे में ढेरों बातें करती। मुझे याद है कि हम भी उन दिनों अपना घर बना रहे थे जिसके बारे में नेहा बहुत बातें करती थी। जहां दीक्षा घर आने पर अपने दादा दादी का विशेष ध्यान रखती थी वहीं नेहा भी अपनी दादी से विशेष स्नेह करती थी।

अंजली के आंसु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बता रही थी कि कैसे वह मनहूस दिन आया। बात 24/11/2019 की है। दीक्षा अपनी कंपनी द्वारा आयोजित टूर प्रोग्राम में अपनी कंपनी के 15 साथियों सहित घूमने के लिये मनाली आ रही थी। दीक्षा जिस कार में बैठी थी वह सुंदरनगर से 2 कि०मी० पहले दुर्घटनाग्रस्त हो गई व सिर्फ दीक्षा ही इस दुर्घटना में भगवान को प्यारी हो गई अौर याद रह गई कभी न भूलने वाली यादें.......

ऐसा ही कुछ नेहा के साथ हुआ है। 14/03/2015 को सुबह 5.30 बजे करनाल में कार दुर्घटना में हमारी नेहा हम सब को छोड़ कर भगवान के पास चली गई व छोड़ गई कभी न भूलने वाली यादें.......

बातें करते करते मेरी यह स्तिथि हो गई थी कि अब मुझ से बहिन अंजली की बातें नहीं सुनी जा रही थी। उधर बहिन अंजली के आंसु इधर मेरे आंसु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मैने फोन अपनी घरवाली को दिया। मैं सुन रहा था वह सांत्वना दे रही थी व खुद अपने आंसुओं को रोकने का प्रयास कर रही थी। एक जैसी स्तिथि से गुजरी दोनो मां एक दूसरे को अपनी बातें सुना रही थी व ढाढस बंधा रही थी। मेरी पत्नी बता रही थी कि कैसे नेहा की याद में नेहा मानव सेवा सोसाइटी बनाने के बाद कई जरुरतमंद बच्चों में हमने अपनी नेहा का ही रुप देखा है। मेरी पत्नी ने दीक्षा के पापा से भी बात की जो बिल्कुल टूट चुके हैं। मैं यह जानता हूं कि उन्हे इस हादसे से निकलने में समय लगेगा।

"समय अपने समय पर सब जख्मों को भर देता है परंतु निशान कभी नहीं मिटते हैं।"

इस कहानी को सुनने के बाद रात को बहुत देर तक सो नहीं पाया। रह- रह कर नेहा व दीक्षा का जीवन वृत मेरी आंखों में घूमता रहा। मैने कभी जीवन में दीक्षा व उसके परिवार वालों को न तो देखा है न मिला हूं। फेसबुक के माध्यम से ही हमारा मिलन हुआ है व परसों से ही बेचैन था कि दीक्षा के बारे में #स्नेह संवाद में जरुर लिखुंगा। आज सुबह अंजली को फोन किया व बड़ी हिम्मत करके बेटी दीक्षा के फोटो मांगे। नेहा- दीक्षा की कहानी को आपके समक्ष रख कर प्रार्थना करता हूं कि परमपिता दोनो बेटियों को बैकुण्ठ में स्थान दे। दीक्षा के परिवार को इस दु:ख को सहन करने की शक्ति दे व इस हादसे से जल्दी उबर जायें  यही प्रार्थना करता हूं।

दोनो बेटियां कहीं नहीं गई हैं क्योंकी श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है कि यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है अौर न मरता (ही) है तथा न (यह) उत्पन्न होकर फिर होने वाला (ही) है; ( क्योंकि) यह अज्नमा, नित्य, सनातन अौर पुरातन (है); शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।।
प्रगति मीडिया
रिपोर्टर राजेश कुमार
हिमाचल प्रदेश

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ऐसा ही वाक्य हमारे साथ भी हुआ है। हम भी अपनी दीक्षा को बचपन में ऐसा कहते थे कि तू हमें मिली हुई है, तो एक बार रूठ गई थी व कहने लगी थी कि मैं सबको छोड़ कर चली जाऊंगी। यह बात जब मुझे दीक्षा की मां अंजली चोपड़ा ने फोन पर बताई तो यादों का सिलसिला चल पड़ा। दो दिन पहले मेरी लगभग 95 मिनट अंजली से फोन पर बातें हुई। अंजली ने जो बातें बताई उनसे मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि कैसे नेहा- दीक्षा के जीवन में इतनी समानतायें रही हैं। कैसे दोनो का जीवन रुहानी रहा है।
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